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छठ पूजा: खरना आज, जानते है क्या है इसका महत्व और पूजा करने की विधि




बिहार: आस्था के महापर्व छठ का दूसरा दिन खरना कहलाता है। नहाय-खाय की बाहरी स्वच्छता के बाद यह दूसरा दिन आतंरिक शुद्धता का होता है। इस दिन व्रती लोग अंतःकरण को पूरी तरह से शुद्ध करके सूर्य देव की पूजा के लिए खुद को तैयार करते हैं। खरना के दिन बिहार-झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और जहां भी छठ पर्व हो रहा होता हो, वहां रोटी और खीर खाने का प्रचलन है. 
खरना शब्द का अर्थ होता है शुद्धिकरण करना. यह शब्द खरा से बना हुआ है। जैसे सोने की शुद्धता के लिए खरा सोना शब्द का प्रयोग करते हैं। इस दिन व्रती लोग एक समय भोजन करते हैं और इसके बाद अपने शरीर और मन को शुद्ध करना आरंभ कर देते हैं.
खरना से 36 घंटे का निर्जला उपवास शुरू हो जाता है। इस दौरान ना ही जल ग्रहण करते हैं और ना ही अन्न का एक दाना खाते हैं और यही वजह है कि खरना के दिन से छठ पूजा का सबसे कठिन दिन माना गया है।   
खरना के दिन व्रती कुल देवता और सूर्य देवता और साथ में छठ मैया की पूजा करते हैं और गुड़ से बनी खीर बनाते हैं और इसे ही भोग के रूप में अर्पित करते हैं। खरना के प्रसाद में चावल, घी लगी रोटी, गन्ने का रस, गुड़ से बनी रसिया, इत्यादि चीजें बनाई जाती है। इसके बाद बाद इन सभी चीजों का भगवान सूर्य को भोग लगाया जाता है और उसके बाद सब लोग इस भोग को प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं।

छठ पूजा के दूसरे दिन गोधूलि बेला में भगवान सूर्य के प्रतिरूप को लकड़ी के एक पटरी पर स्थापित किया जाता है और उसके बाद इनकी पारंपरिक रूप से पूजा का विधान बताया गया है। खरना के बाद व्रत करने वाले लोग दो दिनों तक साधना में होते हैं। इस बात का विशेष ध्यान रखें कि आप जमीन पर ही सोयें. इस दौरान बिस्तर पर सोना वर्जित होता है।
खरना के दिन प्रसाद ग्रहण करने के बाद व्रत शुरू हो जाता है। खरना व्रत के दिन व्रती को शाम को स्नान करना होता है। इस दौरान विधि विधान से प्रसाद तैयार किया जाता है। खरना के प्रसाद में मूली और केला इत्यादि शामिल किया जाता है। इस दौरान बनने वाले प्रसाद मिट्टी के चूल्हे पर बनाए जाते हैं। सूर्य भगवान की पूजा करने के बाद व्रती महिलाएं प्रसाद ग्रहण करती हैं। 


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